Satya means “truth” and Narayana means, “The highest being”. Hence, Satyanarayan means “The highest being who is an epitome of Truth”. Worshipping Lord Vishnu is known as Satyanarayan Puja. Hindus perform this Sri Satyanarayan Vrat and Puja to achieve blessings of health, wealth, prosperity; relief from troubles, and sickness. It can also be performed after achieving a milestone, success in business, or career growth. It is also performed during various social events such as marriages, grih-pravesh, etc.
It is a very simple Puja and can be performed by everyone. This Puja does not need any reason to be performed and can be performed at any time.
The main concept of performing this Puja was to remove the sufferings of malnutrition on earth. Once, Narad Muni saw people suffering from multiple diseases on Earth then he went to the Lord Vishnu to discuss the problem. According to religious books, Lord Vishnu then himself described the Sri Sathyanarayana Vrat and Puja Kath on the request of Devarshi Narada. Lord Vishnu told Narad, ‘One who will perform Satyanarayan Vrat Puja will achieve success in life, relief from troubles, and sickness.’
Satyanarayan puja can be performed both in the morning or in the evening and but the devotee should have to keep fast till the distribution of Prasad. On Puja Day, people decorate the house and doors by the mango leaves.
Puja is done using Kalash, Banana Leaves, Rori, Fruits, Betel Leaf, Kumkum, Milk, Tulsi Leaves, Ganga Water, Dry Fruits, etc.
Satyanarayan puja takes almost 2 to 3 hours to complete. Satyanarayana Puja begins with the worship of Lord Ganesha. Mata Lakshmi and Brahma Ji are worshiped after Lord Ganesha. Finally, the Aarti is performed after worshiping Lord Vishnu. At the end of the Satyanarayan Puja, Prasad is distributed to everyone.
Submitted by Nimanshi
सत्य नारायण की पूजा हिन्दू धर्म में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखती है। यह पूजा मन को शांत रखने के लिए और विशेष कार्यों के लिए की जाती हैं। इसे कुछ लोग मन्नत पूरी करने के लिए, तो वहीं कुछ लोग नियमित रूप से ही करवाना पसंद करते है।
पूजन का मंडप करें तैयार
सत्यनारायण की पूजा शुरू करने से पहले मंडप तैयार कर लेना चाहिए। सर्वप्रथम पूजा की जगह को साफ – सुथरा कर लें। अब आप अपना मुख उत्तर या पूर्व की तरफ करके बैठे। फिर पाटा पर शुभ चिह्न बनाएं। फिर चावल से स्वस्तिक या अष्टदल बनाएं। अब पूजा स्थान पर भगवान गणेश को पान सुपारी से स्थापित कर दें। इसके बाद, सत्यनारायण की तस्वीर या मूर्ति से भगवान विष्णु की भी स्थापना कर लें।
इन सबके बाद शंख की स्थापना सत्यनारायण की मूर्ति अथवा तस्वीर के दाहिनी तरफ कर लें। अब कलश स्थापना करके कलश के ऊपर शक्कर या फिर चावल से भरी कटोरी को रख लें। चावल की कटोरी के ऊपर नारियल को स्थापित करें।
अब पाटे के आगे की तरफ नवग्रह मंडल बना लें। इसके लिए एक सफेद कपड़ा बिछा लें और फिर उस पर नौ जगह चावल की ढेरी को रख लें। इनमें नवग्रहों का पूजन, सत्यनारायण की पूजा के दौरान किया जाना होता है।
इन सबके बाद अब आप पंचामृत, गेहूं के आटे की तैयार की गई पंजीरी या चीनी का बूरा, फल, नारियल इन सबको सवा मात्रा (सामर्थ अनुसार) में एकत्रित कर लें। पूजा शुरू होने से पहले ये सारा सामान भगवान की तस्वीर के आगे रख लें।
सत्यनारायण पूजन की विधि
वैसे तो सत्यनारायण की पूजा करने के लिए विशेष समय निर्धारित नही है, लेकिन फिर भी माह में एक बार श्री सत्यनारायण का पूजा पूर्णिमा एवं संक्रांति के दिन प्रातः या सायं काल में किया जाना शुभ माना जाता है।
सत्यनारायण पूजा के दौरान भगवान् विष्णु की मूर्ति के स्नान के लिए तांबे का लोटा और तांबे का पात्र ज़रूरी होता है। श्री सत्यनारायण की मूर्ति को अर्पित किए जाने वाले वस्त्र व आभूषण के साथ ही जल का कलश, दूध, दीपक, तेल, रुई, धूपबत्ती, फूल, अष्टगंध, चावल, कुमकुम, तिल, जनेऊ और तुलसीदल आवश्कता सामग्री में शामिल होती है। इन सबके आलावा प्रसाद के लिए गेंहू के आटे की पंजीरी के साथ ही फल, दूध, मिठाई, नारियल, पंचामृत, सूखे मेवे, चीनी, पान ले लें।
सत्यनारायण पूजा से पहले अच्छे से स्नान करके नए अथवा अच्छे से साफ किए गये वस्त्र धारण कर पड़ता है। अब माथे पर तिलक लगाकर पूजन की शुरुआत भगवान गणेश का नाम लेकर करें। भगवान गणेश के बाद माता लक्ष्मी और ब्रम्हा जी की पूजा की जाती है। अंत में भगवान विष्णु की पूजा करने के बाद आरती की जाती है। पूजा समाप्त होने के पश्चात् सभी में प्रसाद वितरण किया जाता है।
निष्कर्ष
ऐसा कहा जाता है कि सत्यनारायण भगवान की पूजा मात्र से ही पूण्य की प्राप्ति होती है। हिन्दू धर्म में इस पूजा का विशेष महत्त्व है।
Submitted by Aarti
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हिन्दू धर्म मे सत्यनारायण भगवान की पूजा एवं कथा से सदियों से धरतीवासियों का कल्याण होता आ रहा है। सत्यनारायण भगवान की पूजा वेसे तो किसी भी विशेष अवसर पर करवाई जा सकती है लेकिन पूर्णिमा के दिन इस पूजा को कराने पर विशेष फल प्राप्त होता है। सत्यनारायण भगवान की पूजा किसी विशेष कार्य जैसे मुंडन, ग्रह-प्रवेश, संतान उत्पत्ति, जन्मदिन, शादी इत्यादि पर भी कराई जाती है।
महत्व– सत्यनारायण भगवान का व्रत और पूजा हिन्दू धर्म मे सबसे बड़े व्रतों में से एक है। यह पूजा सत्यनारायण भगवान को प्रसन्न करने के लिए की जाती है। इसके अलावा सत्यनारायण भगवान की पूजा मनोकामनाओ को पूर्ण होने पर भी की जाती है। मान्यता अनुसार कोई भी रुका हुआ या अधूरा काम इस पूजा को करने के बाद पूरा हो जाता है। इस पूजा का महत्व गीता में भी बताया गया है।
पूजा की विधि– पूजा विधि शुरू करने के पूर्व मंडप तैयार किया जाता है। मंडप के लिए एक चौकी पर कोरा लाल वस्त्र बिछाकर चौकी के चारों तरफ केले के पत्ते लगाए जाते है और उसकी मदद से ही मंडप तैयार किया जाता है। उसके बाद सबसे पहले चौकी पर अष्टदल बनाकर सुपारी से भगवान गणेश की स्थापना की जाती है और फिर भगवान सत्यनारायण की तस्वीर को स्थापित किया जाता है। बाद में जल से भरा कलश चौकी के सामने रख कर उसपर चावल से भरा कसोरे को रख दिया जाता है। फिर धूप-दीप जलाया जाता हैं। फिर पंचामृत में तुलसी के पत्ते मिलाकर प्रसाद तैयार किया जाता है। इसके बाद संकल्प लेके पूजा आरम्भ की जाती है, और सत्यनारायण भगवान की कथा सुनी जाती है। उसके बाद सत्यनारायण भगवान की आरती की जाती है और अंत में प्रसाद वितरण किया जाता है।
निष्कर्ष– यह एक धार्मिक पूजा है, और यह हिन्दू धर्म मे विशेष महत्व रखता है। यह पूजा किसी शुभ काम के अवसर पर किया जाता है। इस पूजा को करने वाले व्यक्ति के घर मे सुख समृद्धि एवं धन-धान्य की प्राप्ति होती है।
Submitted by Shweta Tiwari